Monday, December 11, 2023

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग के गठन पर रार, पीएम मोदी को लिखा पत्र, नहीं तो होगा राष्ट्रव्यापी आंदोलन



केंद्र सरकार में अब 8वें वेतन आयोग के गठन पर रार मची है। पिछले दिनों केंद्रीय वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने कहा था, सरकार द्वारा आठवां वेतन आयोग गठित करने की कोई योजना नहीं है। इसके बाद केंद्रीय कर्मचारी संगठन, सक्रिय हो गए। पहले तो 'अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने कहा, केंद्र सरकार द्वारा आठवां वेतन आयोग गठित न करने का फैसला, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन होगा। दूसरी तरफ आठ दिसंबर को कन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एंप्लाइज एंड वर्कर्स के महासचिव एसबी यादव ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख दिया है। इसमें उन्होंने आग्रह किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में बिना किसी विलंब के आठवें वेतन आयोग का गठन किया जाए।

आयोग के गठन का सही समय है

कन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एंप्लाइज एंड वर्कर्स के महासचिव एसबी यादव ने अपने पत्र में लिखा है, यह आठवें वेतन आयोग के गठन का सही समय है। केंद्र सरकार के कर्मचारी, सरकार की रीढ़ की तरह काम करते हैं। ये कर्मचारी, सरकार की नीतियों को आम जन तक पहुंचाने का काम पूरी तन्मयता से करते हैं। केंद्र सरकार में पिछली बार 2016 में वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गई थीं। इसके बाद देश में कोविड संक्रमण हुआ। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को भारी इजाफा देखा गया। प्रोडेक्शन इंडस्ट्री, निर्माण और स्वास्थ्य सेक्टर में भी तेजी देखने को मिली। ब्याज की ऊंची दरें भी सरकारी कर्मियों के लिए मुसीबत का सबब बनीं। महंगाई दर भी औसतन 4 से 7 फीसदी के बीच रही है।

दस साल की अवधि पर वेतन आयोग का गठन

यादव ने अपने पत्र में पांचवें और छठे वेतन आयोग की सिफारिशों का भी जिक्र किया है। दस साल की अवधि पर वेतन आयोग का गठन होना चाहिए। साथ ही डीए/डीआर की दर अगर पचास फीसदी के पार हो जाती है, तो वेतन भत्तों में बदलाव होता है। इससे पहले गठित हुए वेतन आयोगों ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में करीब दो वर्ष का समय लिया है। इसके बाद सरकार भी रिपोर्ट को लागू करने में छह माह का समय ले लेती है। कन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एंप्लाइज एंड वर्कर्स के महासचिव एसबी यादव ने प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में बिना किसी विलंब के आठवें वेतन आयोग का गठन किया जाए। उन्होंने अपने पत्र में छठे वेतन आयोग के पैरा 1.1.4 का हवाला भी दिया है।

राष्ट्रव्यापी आंदोलन का एलान किया

सातवें वेतन आयोग का गठन 2013 में हुआ था। केंद्रीय कर्मचारियों, सशस्त्र बलों के कर्मचारियों और राज्य कर्मियों पर आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जनवरी 2026 से लागू किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे में आठवें वेतन आयोग का गठन किया जाना जरूरी है। अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने कहा है, केंद्र सरकार द्वारा आठवां वेतन आयोग गठित न करने का फैसला, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन होगा। केंद्र एवं राज्यों के लाखों सरकारी कर्मचारी, सड़कों पर उतरेंगे। महासंघ की 28-30 दिसंबर को कोलकाता में होने वाली नेशनल काउंसिल की बैठक में केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ अन्य कर्मचारी संगठनों को साथ लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन का एलान किया जाएगा।  

2013 में गठित हुआ 7वां वेतन आयोग

बतौर सुभाष लांबा, केंद्रीय वित्त सचिव टीवी सोमनाथन का यह बयान इशारा करता है कि 48.67 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 67.95 लाख पेंशनभोगियों के लिए सरकार के एजेंडे में आठवां वेतन आयोग गठित करने की कोई योजना नहीं है। इस बयान से केंद्रीय एवं राज्य कर्मियों एवं पेंशनर्स को तगड़ा झटका लगा है। उनमें आक्रोश व्याप्त है। वेतन आयोग से देश के कर्मचारियों एवं पेंशनर्स को उनके वेतन, पेंशन और भत्तों में कुछ बढ़ोतरी होने की उम्मीद बनी रहती है। केंद्रीय कर्मचारियों, सशस्त्र बलों और राज्य सरकार के कर्मियों पर आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जनवरी 2026 से लागू किया जाना प्रस्तावित है। पिछला वेतन आयोग 2013 में गठित हुआ था, जबकि इसकी सिफारिशें 2016 में लागू हुई थीं।

नेशनल काउंसिल की बैठक में 600 डेलीगेट्स

अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ की 28-30 दिसंबर को कोलकाता में होने वाली नेशनल काउंसिल की बैठक में केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ अन्य कर्मचारी संगठनों को साथ लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन का एलान होगा। नेशनल काउंसिल की बैठक में सभी राज्यों से करीब 600 डेलीगेट्स भाग लेंगे। महासचिव ए श्रीकुमार ने बताया, कर्मचारियों ने आंदोलन के दम पर हर दस साल बाद वेतनमान व पेंशन में संशोधन के लिए वेतन आयोग के गठन का प्रावधान कराया था। अब तक सात केंद्रीय वेतन आयोगों का गठन हुआ है। केंद्र सरकार ने इनकी सिफारिशों को केंद्रीय कर्मचारियों एवं पेंशन भोगियों पर लागू किया है। जब केंद्र सरकार, वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करती है, तो उसके बाद राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों एवं पेंशन भोगियों पर उक्त सिफारिशों को लागू करती हैं।

एनपीएस में कोई संशोधन मंजूर नहीं

केंद्र सरकार द्वारा आठवां वेतन आयोग गठित करने से इनकार करने के बाद राज्य कर्मियों का रास्ता अपने आप बंद हो गया है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 48.67 केंद्रीय कर्मचारी और 67.95 लाख पेंशन भोगी हैं। इससे ज्यादा राज्य सरकारों और पीएसयू के कर्मचारी एवं पेंशनर्स हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने बताया, वित्त सचिव के बयान के अनुसार, केंद्र सरकार एनपीएस में कुछ संशोधन करने जा रही है। सरकार ने पेंशन प्रणाली की समीक्षा के लिए वित्त सचिव के नेतृत्व में समिति का गठन किया था। वित्त सचिव टीवी सोमनाथन का कहना है, हमने सभी पक्षों के साथ विचार विमर्श पूरा कर लिया है। हमारी रिपोर्ट जल्द ही दाखिल हो जाएगी। लांबा ने दो टूक शब्दों में कहा, कर्मचारियों को एनपीएस में कोई भी संशोधन मंजूर नहीं है।

Sunday, December 10, 2023

छत्तीसगढ़ के CM का एलान: इस वजह से विष्णुदेव साय के नाम पर लगी मुहर

 


छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज करने के बाद भाजपा ने राज्य के मुख्यमंत्री के रुप में प्रदेश के आदिवासी नेता विष्णुदेव साय पर दांव लगाया है। रविवार को हुई पार्टी की विधायक दल की बैठक में साय नेता चुने गए। साय छत्तीसगढ़ की कुनकुरी विधानसभा से चुनकर आते हैं। राज्य में आदिवासी समुदाय की आबादी सबसे अधिक है। साय इसी समुदाय से आते है। वे राज्य के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे। वे भाजपा से आने वाले भी पहले आदिवासी सीएम होंगे। हालांकि, पूर्व सीएम अजीत जोगी को भी राज्य का पहला आदिवासी समाज से आने वाला मुख्यमंत्री माना जाता है, लेकिन उनकी जाति से जुड़ा मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।

भाजपा ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले किसी को सीएम के चेहरे को पेश नहीं किया था। पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा था, लेकिन जीत के बाद एक हफ्ते तक रायपुर से दिल्ली तक सीएम के चेहरे को लेकर मंथन का दौर चला। अब पार्टी ने इस रेस में आदिवासी समाज से आने वाले विष्णुदेव साय के नाम पर मुहर लगा दी है। 


छत्तीसगढ़ को आदिवासी राज्य के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यहां की 32 फीसदी आबादी एसटी कैटेगरी में आती है। इसलिए आदिवासी समुदाय से आने वाले बीजेपी नेता विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना हैं। दरअसल, विष्णुदेव साय ने अपने इलाके में जो किया है। वो कमाल ही कहा जाएगा। उन्होंने क्षेत्र की सभी सीटें कांग्रेस से छीन कर बीजेपी को सौंप दी है। साय खुद कुनकुरी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में थे, जहां उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को 25 हजार से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी है। 

इसके अलावा साय ने अपने साथ साथ सरगुजा संभाग की सभी सीटें भी बीजेपी के खाते में ट्रांसफर करवा दी है। 2018 में सरगुजा के लोगों ने ये मानकर कांग्रेस को वोट दिया था कि टीएस सिंह देव प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे। इसलिए कांग्रेस ने सभी 14 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन ढ़ाई साल बाद जब सीएम नहीं बदला गया तो सरगुजा के लोगों ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया। इसका असर चुनाव में दिखा। सभी 14 सीट कांग्रेस से भाजपा की तरफ ट्रांसफर हो गया।

शाह ने पहले की कर दिया था इशारा
प्रदेश के सरगुजा संभाग के प्रदर्शन ने विष्णुदेव साय की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को मजबूती दी है। साय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ साथ पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का भी करीबी माना जाता है। साय इससे पहले वो छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष और मोदी सरकार की पहली पारी में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। 

विष्णु देव साय की राज्य के सीएम बनने की एक बड़ी वजह गृहमंत्री अमित शाह का बयान है। चुनाव के दौरान अमित शाह ने बस इतना ही कहा था, 'इनके बारे में मैंने कुछ बड़ा सोचा है।' प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में तो कुछ बड़ा सोचा है इसका मतलब मुख्यमंत्री बनाना ही होता है और शाह ने अपना वादा आखिर पूरा किया। 

1989 से साय ने शुरू की है राजनीति
छत्तीसगढ़ की राजनीति में विष्णुदेव साय इसलिए बड़ा नाम है, क्योंकि वे चार बार सांसद, दो बार विधायक, केंद्रीय राज्य मंत्री और दो-दो बार के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं। इसके साथ ही उन्हें संगठन में काम करने का लंबा अनुभव भी है। साल 2023 में विधानसभा चुनाव में उन्होंने कुनकुरी सीट से जीत हासिल भी की है। प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाए जाने के बाद भी वे पार्टी से लगातार जुड़े रहे। साय ने अपनी राजनीतिक सफर की शुरुआत 1989 में की। सबसे पहले वे एक गांव के पंच के रूप में थे। संघ से जुड़े थे। भारतीय जनता पार्टी ने साल 1990 में उनके ऊपर भरोसा जताकर तपकरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक का टिकट दिया, जिसमें उन्होंने जीत हासिल की। इसके बाद वे रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार के सांसद भी चुने गए। साल 1999 से लेकर साल 2014 तक लगातार तीन बार सांसद रहे। 

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