Thursday, August 31, 2023

CBSE साल में दो बार आयोजित करेगा बोर्ड परीक्षाएं, कक्षा 11वीं, 12वीं के स्टूडेंट को पढ़ने होंगे 2 लैंग्वेज

 

CBSE Board Exam 2024: पिछले कुछ दिनों से बोर्ड परीक्षाएं 2024 सुर्खियों में हैं. दरअसल हाल ही में नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्कूल एजुकेशन का नया नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) तैयार किया गया है. शिक्षा मंत्रालय के नए पाठ्यक्रम ढांचे के अनुसार, बोर्ड परीक्षाएं साल में दो बार आयोजित की जाएंगी, जिसमें छात्रों के पास सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाए रखने का विकल्प होगा, जबकि कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को एक के बजाय दो भाषाओं का अध्ययन करना होगा. सीबीएसई, सीआईएससीई, यूपी, बिहार बोर्ड समेत तमाम स्टेट बोर्ड की बोर्ड परीक्षाएं भी अब से साल में दो बार आयोजित की जाएंगी. 


एनसीएफ की गाइडलाइंस के मुताबिक साल में दो बार होने वाली बोर्ड परीक्षाएं टर्म वाइज आयोजित नहीं की जाएंगी. जिस परीक्षा में स्टूडेंट के अच्छे मार्क्स होंगे, वहीं स्कोर मान्य होंगे. इसका मतलब है कि अब बोर्ड परीक्षा पास करने के लिए स्टूडेंट को साल में दो मौके मिलेंगे. 


शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार कर लिया गया है और 2024 शैक्षणिक सत्र के लिए इसके आधार पर पाठ्यपुस्तकें विकसित की जाएंगी. अंतिम एनसीएफ (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा) दस्तावेज़ में कहा गया है, "कक्षा 11वीं और 12वीं में, छात्रों को दो भाषाओं को पढ़ना होगा और उनमें से एक भारतीय भाषा होनी चाहिए."


नए करिकुलम फ्रेमवर्क के तहत बोर्ड परीक्षाओं को आसान बनाने पर जोर दिया जाएगा. इसके तहत अब हल्का बोर्ड परीक्षएं महीनों की कोचिंग और रट्टा लगाने के बजाय विद्यार्थियों की समझ और दक्षता का आकलन किया जाएगा. यही नहीं कक्षा 11वीं और 12वीं में विद्यार्थियों को चयन आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स स्ट्रीम तक सीमित नहीं रहेगा. बल्कि स्टूडेंट को पसंद का विषय चुनने की पूरी आजादी होगी. 

एनसीएफ में कहा गया, "छात्रों को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए पर्याप्त समय और अवसर मिले यह सुनिश्चित करने के लिए वर्ष में कम से कम दो बार बोर्ड परीक्षा की पेशकश की जाएगी. छात्र तब उन विषयों में बोर्ड परीक्षा दे सकते हैं जिन्हें उन्होंने पूरा कर लिया है और जिसके लिए वे तैयार महसूस करते हैं.''

Saturday, August 26, 2023

स्कूली शिक्षा: वर्तमान सदी और भारतीय परंपराओं के अनुरूप है राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा

 



केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की जो रूपरेखा (एनसीएफ) लॉन्च की है, उसमें उन सभी तत्वों को शामिल किया गया है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में प्रस्तावित किए गए थे। हर देश की तरह भारत भी यह चाहता है कि उसकी शिक्षा पद्धतियां यहां की संस्कृति और ज्ञान परंपरा से आलोकित हों और शिक्षा व्यवस्था की जड़ें देश की ज्ञानार्जन परंपरा से जुड़ी हों। गौरतलब है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का ब्रिटिशकालीन अनुभव अच्छा नहीं रहा। इसका उद्देश्य एक वर्ग विशेष को फायदा पहुंचाना और अपने लिए लोग तैयार करना था। लेकिन जो नई रूपरेखा पेश की गई है, उसमें भारतीय शिक्षा व्यवस्था के पुराने अनुभवों और कमियों पर बेहतर ढंग से विचार किया गया है।


नई रूपरेखा में बच्चों पर पड़ने वाले तनाव पर खास ध्यान दिया गया है। पिछले काफी समय से स्कूली बच्चों पर पुस्तकों, पाठ्यक्रम और परीक्षा के बढ़ते भय को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं, जिनके समाधान के लिए एनसीएफ में प्रयास किए गए हैं। वर्ष में दो बार बोर्ड की परीक्षा और छात्रों के पास इन बोर्ड परीक्षाओं में से सर्वश्रेष्ठ अंक चुनने का विकल्प जैसे प्रावधान निश्चित ही बच्चों पर से पढ़ाई के बोझ को हल्का करेंगे। हालांकि इसके लिए स्कूलों और बोर्ड को अपना प्लेटफॉर्म तैयार करना होगा। बच्चे जब भी खुद को तैयार पाएंगे, वे अगली परीक्षा में भाग ले सकेंगे।

दरअसल, साल में एक बार होने वाली परीक्षा में बच्चों को अनेक दिक्कतें आती हैं। साल भर जो भी पढ़ा है, उसे कंठस्थ कर परीक्षा देने का तनाव हम सभी समझ सकते हैं। फिर यही तनाव कोचिंग व्यवस्था के पैदा होने की वजह बनता है और कोटा जैसे कोचिंग के गढ़ पैदा होते हैं। पिछले कुछ ही महीनों में कोटा में 20 से अधिक बच्चों के आत्महत्या कर लेने के मामले सामने आए हैं। पूरा देश ऐसी घटनाओं से शर्मसार होता है। बड़ा सवाल यह है कि ‘कोटा’ क्यों पनप रहा है?

स्कूलों को समझना होगा कि इसकी वजह वे खुद हैं। उनकी लचर व्यवस्थाओं के चलते ही बच्चे कोटा जाने की जरूरत महसूस करते हैं। मेरा सुझाव यह है कि इसके लिए गांवों के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाना होगा। प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी होगी। बच्चों को बचपन से ही प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मानसिक तौर पर तैयार करने की शुरुआत वहीं से करनी होगी। अच्छी बात यह है कि सरकार इसके लिए पूरी तरह से गंभीर है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने स्वयं कहा है कि अब विद्यार्थियों को कोचिंग व रटने के जंजालों से मुक्ति मिल सकेगी।

मैं 1962 से पढ़ा रहा हूं और कई स्कूलों को जानता हूं, जहां स्कूली शिक्षा के साथ प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा की सीख बच्चों को दी जा रही है और ऐसे बच्चे प्रतिस्पर्धाओं में सफल होेते हैं। लेकिन इसके लिए शिक्षकों को भी कमर कसनी होगी, ताकि भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बच्चों पर हावी न हो सके। एनसीएफ रूपरेखा में इन सभी बिंदुओं को संज्ञान में लिया गया है। हालांकि फिलहाल यह किस तरह से होगा, इस पर सीबीएसई और एनसीईआरटी से आगे जानकारी आएगी।

मुझे अपना एक अनुभव याद आता है, जब मैं 1982 में तत्कालीन सोवियत संघ गया था। वहां पांचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की अभिरुचि का खास ख्याल रखा जाता था। सरकार ने आवासीय स्कूल बनवाए थे, जिनमें सामान्य पढ़ाई के साथ बच्चों की अभिरुचियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं। अगर यही पैटर्न भारत में अपनाया जाता है, तो इससे सरकारी स्कूल मजबूत बनेंगे। निजी स्कूलों का चलन कम होगा। इससे कोटा जैसे केंद्र हतोत्साहित किए जा सकेंगे और हर बच्चा देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकेगा। हालांकि एनसीएफ में भी इस मामले को पूरी गंभीरता से लिया गया है। इसमें नौवीं व 12वीं कक्षा के पाठ्यक्रम को इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि छात्र स्वयं तय कर सकें कि उन्हें किस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना है।

अगले शैक्षणिक सत्र के लिए एनसीएफ गाइडलाइंस के अनुसार, पुस्तकें तैयार करने की जिम्मेदारी एनसीईआरटी को सौंपी गई है, जो तीसरी से बारहवीं कक्षा के लिए नए पाठ्यक्रम के अनुसार किताबें तैयार कर रही है। जो इस सारे परिवर्तन का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पुनर्विचार करने की जरूरत है। एनसीएफ के दिशा-निर्देश सभी राज्यों की सहभागिता से तैयार हुए हैं। विभिन्न राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों व सांविधानिक पदों पर बैठे विद्वानों की सलाहों को इसमें शामिल किया गया है।

शिक्षा को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। एनसीईआरटी स्थानिकता का महत्व समझती है। इसीलिए, वह पहले भी कहती रही है कि हर राज्य अपनी मातृभाषा में किताबें तैयार करे और उसमें स्थानीय पाठ्यक्रम/पाठ शामिल करे। अब अगर पर्यावरण पर कोई अध्याय है, तो उसकी विषय-वस्तु तिरुअनंतपुरम और त्रिपुरा में एक समान नहीं हो सकती। लेकिन स्तर एक होना चाहिए। देश के सभी शिक्षा बोर्ड एनसीईआरटी से जुड़े हैं। यह बेशक एक सलाहकारी निकाय है। लेकिन इसकी साख पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। एनसीएफ के दिशा-निर्देश देश की शैक्षिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लाए गए हैं। इसलिए, आलोचना करने से पहले हम सभी को गंभीरतापूर्वक इन दिशा-निर्देशों का अध्ययन करना चाहिए।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का अवलोकन करते हुए मुझे रवींद्रनाथ टैगोर का कथन याद आता है। उन्होंने कहा था कि हर बच्चे को बगैर किसी भेद-भाव के दो वरदान मिले होते हैं। पहला, विचारों की शक्ति और दूसरा, कल्पना की शक्ति। मैं इनमें दो तत्व और जोड़ना चाहता हूं, जिज्ञासा और सृजनात्मकता। जब इन चारों की अवहेलना होती है, तब शिक्षा व्यवस्था कुंठित हो जाती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में इन चारों पर ध्यान दिया गया है, ताकि ज्ञान समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘नवाचार’ पूरी हो सके। लेकिन इनकी कामयाबी निर्भर करेगी शिक्षकों पर, जो कि सही मायनों में राष्ट्र-निर्माता हैं।

हमारी शिक्षा व्यवस्था की मूल आवश्यकता अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की है। इसे नैतिकता और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की है। इसे गांधी के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के कल्याण तक ले जाने की है। 'वसुधैव कुटुंबकम' हमारी ज्ञान परंपरा का आधार रहा है और अच्छी बात है कि किताबों में 21वीं सदी की जरूरतों के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को खास तौर पर शामिल किया गया है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, वह इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने की ओर उन्मुख है।
-शिक्षाविद और एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक

Friday, August 25, 2023

Aditya L1: चंद्रयान-3 की सफलता के बाद आदित्य-एल1 की तैयारी तेज, आखिर सूर्य का अध्ययन करने क्यों जा रहा मिशन?


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक उतारकर इतिहास रच दिया। उत्साह से लबरेज राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी का अभियान यहीं नहीं रुकने वाला है। एजेंसी अगले महीने आदित्य-एल1 मिशन को लॉन्च करने की तैयारी में जुटी है। इस मिशन का उद्देश्य सूर्य का अध्ययन करना है।

चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब दुनिया की नजर आदित्य-एल1 मिशन पर होगी। आदित्य-एल1 क्या है? मिशन के उद्देश्य क्या हैं? मिशन के घटक कौन-कौन से हैं? इसे कब लॉन्च किया जाएगा? सूर्य का अध्ययन क्यों जरूरी है? 

पहले जानते हैं आदित्य-एल1 क्या है?
आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन है। इसके साथ ही इसरो ने इसे पहला अंतरिक्ष आधारित वेधशाला श्रेणी का भारतीय सौर मिशन कहा है। अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित करने की योजना है जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर है। दरअसल, लैग्रेंजियन बिंदु वे हैं जहां दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। इस वजह से एल1 बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान के उड़ने के लिए किया जा सकता है।


मिशन के उद्देश्य क्या हैं?

भारत का महत्वाकांक्षी सौर मिशन आदित्य एल-1 सौर कोरोना (सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी भाग) की बनावट और इसके तपने की प्रक्रिया, इसके तापमान, सौर विस्फोट और सौर तूफान के कारण और उत्पत्ति, कोरोना और कोरोनल लूप प्लाज्मा की बनावट, वेग और घनत्व, कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की माप, कोरोनल मास इजेक्शन (सूरज में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोट जो सीधे पृथ्वी की ओर आते हैं) की उत्पत्ति, विकास और गति, सौर हवाएं और अंतरिक्ष के मौसम को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन करेगा।

मिशन के घटक कौन-कौन से हैं?
आदित्य-एल1 मिशन सूर्य का व्यवस्थित अध्ययन करने के लिए सात वैज्ञानिक पेलोड का एक सेट ले जाएगा। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (वीईएलसी) सूर्य के वायुमंडल के सबसे बाहरी भाग यानी सौर कोरोना और सूरज में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोटों यानी कोरोनल मास इजेक्शन की गतिशीलता का अध्ययन करेगा।

सोलर अल्ट्रा-वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (एसयूआईटी) नामक पेलोड अल्ट्रा-वायलेट (यूवी) के निकट सौर प्रकाशमंडल और क्रोमोस्फीयर की तस्वीरें लेगा। इसके साथ ही SUIT यूवी के नजदीक सौर विकिरण में होने वाले बदलावों को भी मापेगा।

आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (एएसपीईएक्स) और प्लाज्मा एनालाइजर पैकेज फॉर आदित्य (पीएपीए) पेलोड सौर पवन और शक्तिशाली आयनों के साथ-साथ उनके ऊर्जा वितरण का अध्ययन करेंगे।

सोलर लो एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS) और हाई एनर्जी L1 ऑर्बिटिंग एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (HEL1OS) विस्तृत एक्स-रे ऊर्जा रेंज में सूर्य से आने वाली एक्स-रे किरणों का अध्ययन करेंगे। वहीं, मैग्नेटोमीटर पेलोड को L1 बिंदु पर दो ग्रहों के बीच के चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए बनाया गया है।

आदित्य-एल1 के सातों विज्ञान पेलोड की खास बात है कि ये देश में विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किए गए हैं। ये सभी पेलोड इसरो के विभिन्न केंद्रों के सहयोग से विकसित किए गए हैं।

कब तक लॉन्च होगा मिशन?
चंद्रयान-3 मिशन की बड़ी सफलता के कुछ घंटों के बाद ही इसरो के प्रमुख एस सोमनाथ ने बुधवार को घोषणा की कि आदित्य एल-1 मिशन सितंबर के पहले सप्ताह में लॉन्च किया जाएगा। मिशन के प्रक्षेपण के बारे में इसरो प्रमुख ने कहा कि सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा है और संभवत: इसे सितंबर के पहले सप्ताह में प्रक्षेपित किया जाएगा।

इसरो के मुताबिक, आदित्य-एल1 मिशन को श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के पीएसएलवी रॉकेट द्वारा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा। प्रारंभ में अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद कक्षा को अधिक अण्डाकार बनाया जाएगा और बाद में प्रणोदन के जरिए अंतरिक्ष यान को L1 बिंदु की ओर प्रक्षेपित किया जाएगा। 

जैसे ही अंतरिक्ष यान L1 की ओर बढ़ेगा, यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र (SOI) से बाहर निकल जाएगा। यहां से बाहर निकलने के बाद क्रूज चरण (यान को नीचे उतारने वाला चरण) शुरू होगा और बाद में अंतरिक्ष यान को एल1 के चारों ओर एक बड़ी प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जाएगा। एजेंसी की मानें तो, लॉन्च से एल1 तक के पूरे सफर में आदित्य-एल1 को लगभग चार महीने लगेंगे।

सूर्य का अध्ययन जरूरी क्यों?
सूर्य निकटतम तारा है और इसलिए अन्य तारों की तुलना में इसका अधिक विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है।  इसरो के मुताबिक, सूर्य का अध्ययन करके हम अपनी आकाशगंगा के तारों के साथ-साथ कई अन्य आकाशगंगाओं के तारों के बारे में भी बहुत कुछ जान सकते हैं। सूर्य एक अत्यंत गतिशील तारा है जो हम जो देखते हैं उससे कहीं अधिक फैला हुआ है। इसमें कई विस्फोटकारी घटनाएं होती हैं इसके साथ ही सौर मंडल में भारी मात्रा में ऊर्जा भी छोड़ता है। 

यदि ऐसी विस्फोटक सौर घटना पृथ्वी की ओर भेजी जाती है तो यह पृथ्वी के नजदीकी अंतरिक्ष वातावरण में कई प्रकार की समस्याएं पैदा कर सकती है। कई अंतरिक्ष यान और संचार प्रणालियां ऐसी समस्याओं का शिकार बन चुकी हैं। लिहाजा पहले से ही सुधारात्मक उपाय करने के लिए ऐसी घटनाओं की प्रारंभिक चेतावनी अहम है। 

इनके अलावा यदि कोई अंतरिक्ष यात्री सीधे ऐसी विस्फोटक घटनाओं के संपर्क में आता है तो वह जोखिम में पड़ सकता है। सूर्य पर कई तापीय और चुंबकीय घटनाएं घटती हैं जो प्रचंड प्रकृति की होती हैं। इस प्रकार सूर्य उन घटनाओं को समझने के लिए एक अच्छी प्राकृतिक प्रयोगशाला भी प्रदान करता है जिनका सीधे प्रयोगशाला में अध्ययन नहीं किया जा सकता है।

Wednesday, August 23, 2023

Chandrayaan-3: सफल लैंडिंग के बाद निगाहें रोवर प्रज्ञान पर, मून मिशन में अब आगे क्‍या-क्‍या होगा? जानें

 


नई दिल्‍ली. भारत के चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) ने अपने निर्धारित समय पर चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रच दिया है और अब इसके बाद मिशन (Mission Moon) का अगला चरण शुरू हो गया है. चंद्रयान का विक्रम के सतह पर लैंड होने के बाद कई तरह से काम करेगा. वैज्ञानिकों ने बताया है कि चंद्रयान-3 मिशन को तीन प्रमुख हिस्से में बांटा गया हैं. सबसे पहला था प्रोप्लशन मॉड्यूल, जो लैंडर को चांद की कक्षा तक लेकर गया है. इससे हाल ही में विक्रम अलग हो गया था जबकि प्रोप्लशन मॉड्यूल चांद की सतह में घूम रहा है. इससे अलग होने वाले लैंडर विक्रम के साथ ही रोवर प्रज्ञान को भेजा गया था. अब लैंडर विक्रम ने चांद पर सफलतापूर्वक उतरकर मिशन का पहला पड़ाव पूरा कर दिया है.

दरअसल इस मिशन में अब रोवर अलग होगा और वह चांद की सतह पर घूमकर कई तरह की जानकारियां, फोटो और डेटा भेजेगा. अब रोवर प्रज्ञान पर निगाहें लगी हुई हैं. भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने चंद्रमा के साउथ पोल वाले हिस्‍से में लैंडिंग की है. यहां रोवर प्रज्ञान कई प्रकार की जांच और संभावनाएं तलाश करेगा. यहां मिट्टी, धरती पर मौजूद तत्‍व, वातावरण में मौजूद खनिज तत्‍व और सबसे महत्‍वपूर्ण पानी होने की संभावनाएं खोजेगा.

चंद्रमा के दक्षिण पोल पर उतरने में पहली सफलता
चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र पर्यावरण और उनके द्वारा पेश की जाने वाली कठिनाइयों के कारण बहुत अलग भूभाग हैं और इसलिए उनका अभी तक अन्वेषण नहीं हुआ है. चंद्रमा पर पहुंचने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में उतरे हैं. चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का भी पता लगाया जा रहा है क्योंकि इसके आसपास के क्षेत्रों में पानी की मौजूदगी की संभावना हो सकती है.

क्‍या-क्या है दक्षिण पोल पर, पूरी मिलेगी जानकारी 
चंद्रमा के दक्षिण पोल पर कई ऐसे क्रेटर्स हैं जो अरबों साल से अंधेरे में हैं और यहां सूरज की रोशनी कभी पहुंच नहीं पाई. ऐसे स्‍थानों पर स्थितियों के बारे में रोवर के जरिए जानकारियां मिल सकती हैं. रोवल दक्षिण पोल पर स्‍पेस साइंस से जुड़ी कई रिसर्च वर्क को पूरा करेगा और सीधी चंद्रमा से जानकारी मिलने से कई तथ्‍यों का वेरिफिकेशन होगा. रोवर प्रज्ञान चांद की सतह पर मौजूद तत्‍वों के बारे में जानकारी लेगा और उसे धरती तक भेजेगा. जानकारी के अनुसार रोवर जानकारियों को पहले लैंडर को भेजेगा और उसके जरिए ये डेटा भारतीय डीप स्‍पेस नेटवर्क तक पहुंचेगा. इसके साथ ही क्‍या चंद्रमा पर पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सिलिकॉन, एल्यूमीनियम, टाइटेनियम और आयरन जैसे तत्‍व मौजूद हैं या नहीं? इसको लेकर भी जानकारी मिलेगी.

Sunday, August 20, 2023

Chandrayaan-3 Latest Update: चंद्रयान-3 की लैडिंग का बदला समय, ISRO ने बताया नया टाइम, यहां देख सकेंगे लाइव



 नई दिल्‍ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-3 मिशन के लैंडर के चंद्रमा की सतह पर उतरने के समय में बदलाव किया है. यह मून लैंडर पहले चांद पर शाम 5 बजकर 47 मिनट पर उतरने वाला था, लेकिन इसरो ने समय में बदलाव करते हुए अब 23 अगस्त को 17 मिनट देरी से यानी शाम 6 बजकर 04 मिनट पर चांद की सतह पर इसे उतारेगा. इसरो ने साथ ही बताया कि चंद्रयान-3 की लैंडिंग का कई प्लेटफॉर्म्स पर सीधा प्रसारण किया जाएगा.

इसरो ने रविवार को कहा कि लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त लैंडर मॉड्यूल के 23 अगस्त को शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा की सतह पर उतरने की उम्मीद है. इससे पहले, इसरो ने कहा था कि मॉड्यूल 23 अगस्त को शाम पांच बजकर 47 मिनट पर चंद्रमा की सतह पर उतरेगा.

ISRO ने इसके साथ ही कहा कि यह उपलब्धि भारतीय विज्ञान, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगी, जो अंतरिक्ष अन्वेषण में भारत की प्रगति का प्रतीक होगी. पूरा देश चंद्रयान-3 को ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ में सफल होते देखना चाहता है. इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम का सीधा प्रसारण 23 अगस्त, 2023 को भारतीय समयानुसार शाम 17:27 बजे शुरू किया जाएगा.

‘सॉफ्ट-लैंडिंग’ का सीधा प्रसारण इसरो की वेबसाइट, इसके यूट्यूब चैनल, इसरो के फेसबुक पेज और डीडी नेशनल टीवी चैनल सहित कई मंचों पर उपलब्ध होगा. इसरो ने कहा, ‘चंद्रयान-3 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ एक यादगार क्षण होगी जो न केवल जिज्ञासा को बढ़ाती है, बल्कि हमारे युवाओं के मन में अन्वेषण के लिए जुनून भी जगाती है.’

इसने कहा, ‘यह गर्व और एकता की गहरी भावना पैदा करता है क्योंकि हम सामूहिक रूप से भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्ति की खुशी मनाते हैं. यह वैज्ञानिक जांच और नवाचार के माहौल को बढ़ावा देने में योगदान देगा.’

इसरो ने कहा कि इसे देखते हुए देशभर के सभी विद्यालय और शैक्षणिक संस्थानों को छात्रों और शिक्षकों के बीच इस कार्यक्रम को सक्रिय रूप से प्रचारित करने और अपने परिसरों में चंद्रयान-3 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का सीधा प्रसारण करने के लिए आमंत्रित किया जाता है.

चंद्रयान-3 का रविवार तड़के दूसरा डीबूस्टिंग ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ है. इसके साथ ही मिशन का अंतिम चरण चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर संचालित है. चंद्रयान-3, मून एक्‍सप्‍लोरेशन सीरीज में भारत का तीसरा मिशन 14 जुलाई को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था.

इस स्‍पेसक्राफ्ट ने 5 अगस्त को लूनर आर्बिट में प्रवेश किया था और यह 23 अगस्त को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला है. ISRO अंतरिक्ष एजेंसी ने एक्स (Twitter) पर पोस्ट कर लैंडिंग के समय की घोषणा की और लोगों को उनकी शुभकामनाओं और सकारात्मकता के लिए धन्यवाद दिया है.

मिशन की सफलता को लेकर आश्वस्त, लेकिन…
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए), बेंगलुरु की निदेशक प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यन ने कहा कि वह इसरो के चंद्रयान -3 की सफलता को लेकर आश्वस्त हैं. उन्‍होंने कहा कि हम बिना किसी समस्या के वहां पहुंच जाएंगे. लेकिन यह आखिरी 30 किमी है; वे काफी महत्वपूर्ण होंगे. अंतरिक्ष के पैरामीटर विशाल हैं और इसमें जटिलताएं शामिल हैं. इसकी हमेशा एक छोटी सी गैर-शून्य संभावना रहेगी कि यह गलत हो सकता है और हम इसे खत्म नहीं कर सकते. लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि हम इस बार ऐसा करेंगे. सुब्रमण्यम ने कहा, ‘इसमें बड़ी तैयारी की गई है और चंद्रयान-3 के सफल होने की संभावना सबसे ज्यादा है.’

Sunday, August 13, 2023

पंजाब के शिक्षा मंत्री ने सरकारी स्कूल की फोटो शेयर की, CM केजरीवाल ने की सराहना

 


पंजाब में सकारी स्‍कूलों पर काफी काम हो रहा है. राज्‍य के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर सरकारी स्कूलों की कुछ तस्‍वीरें शेयर की हैं. इन तस्‍वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के शिक्षा विभाग की सराहना की है. सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पंजाब के सरकारी स्कूलों के नए शिक्षाकर्मियों और कक्षाएं प्रमाण हैं कि अब पंजाब भी शिक्षा की क्रांति को साक्षात्कार कर रहा है.


पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के द्वारा जारी स्कूल की तस्वीरों पर अरविंद केजरीवाल ने कहा, "पंजाब के सरकारी स्कूलों के नए शिक्षाकर्मी और कक्षाएं प्रमाण हैं कि अब पंजाब भी शिक्षा की क्रांति को साक्षात्कार कर रहा है.

पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के ट्वीट पर अरविंद केजरीवाल ने शुभकामनाएं दीं, "पंजाब में 10000 नई कक्षाएं विकसित की जा रही हैं और 10000 मौजूदा कक्षाओं को समान तर्ज पर रूपांतरित किया जा रहा है." 

पंजाब के स्कूलों में 10 से 15 वर्षों से पढ़ा रहे 12 हजार से ज्‍यादा अस्थायी टीचरों को भगवंत मान सरकार ने नियमित किया है. नियमित होने वाले इन शिक्षकों के वेतन में दो से चार गुना तक की बढ़ोतरी भी की गई है. 





Saturday, August 5, 2023

OPS vs NPS: पुरानी पेंशन पर सियासत में 'जोखिम' उठा रहा केंद्र? संसद में जवाब के बाद भी पीछे नहीं हटेंगे कर्मी



देश में पुरानी पेंशन लागू कराने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के कर्मचारी संगठन एक साथ आ गए हैं। केंद्र के सभी मंत्रालय/विभाग, रक्षा कर्मी (सिविल), रेलवे, बैंक, डाक, प्राइमरी, सेकेंडरी, कालेज एवं यूनिवर्सिटी टीचर, दूसरे विभागों एवं विभिन्न निगमों और स्वायत्तशासी संगठनों के कर्मचारी 10 अगस्त को दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंचेंगे। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, इस मुद्दे पर टस से मस होने का संकेत नहीं दे रही। संसद सत्र में दो दिन पहले ही वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय कर्मचारियों को न्यूनतम पेंशन देने की खबरों से किनारा कर लिया था। राज्यसभा में वित्त मंत्री से पूछा गया था कि क्या केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति से पहले उनके आखिरी वेतन की 40 से 45 फीसदी रकम पेंशन के तौर पर देने का विचार कर रही है। वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने कहा, सरकार के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। केंद्र सरकार, मौजूदा पेंशन स्कीम की समीक्षा नहीं कर रही है। अब सवाल ये खड़ा होता है कि क्या सरकार 'पुरानी पेंशन' पर सियासत में 'जोखिम' उठा रही है, क्योंकि कर्मचारी संगठनों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वे संसद में दिए गए इस 'जवाब' के बावजूद ओपीएस की मांग से पीछे नहीं हटेंगे।

एनपीएस में कोई सुधार मंजूर नहीं है ...
ओपीएस के लिए गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (एनजेसीए) की संचालन समिति के राष्ट्रीय संयोजक एवं स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' के सचिव शिवगोपाल मिश्रा ने कहा है, केंद्र सरकार संसद में यह बात कह रही है कि ओपीएस लागू नहीं होगी। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। सरकार ये कह रही है कि कर्मियों के आखिरी वेतन की 40 से 45 फीसदी रकम पेंशन के तौर पर देने का कोई विचार नहीं है। अगर कल को सरकार, एनपीएस में कोई सुधार भी करती है, जिसके लिए वित्त मंत्रालय ने कमेटी का गठन कर रखा है तो वह कर्मियों को मंजूर नहीं होगा। कर्मियों का केवल एक ही मकसद है, बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को समाप्त करना। केंद्र सरकार को कर्मियों की मांग पर परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' को बहाल करना होगा। दस अगस्त को केंद्र एवं विभिन्न राज्यों से करीब दो लाख कर्मचारी दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंचेंगे। देश में केंद्र और राज्यों, विभिन्न निगमों एवं दूसरे स्वायत्तता प्राप्त गारंटी वाली ओपीएस योजना को बहाल करना होगा।

केंद्र सरकार ने नेशनल पेंशन स्कीम में बदलाव के लिए वित्त सचिव की अध्यक्षता में चार सदस्यों की जिस कमेटी का गठन किया था, उसने 9 जून को स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' के पदाधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें केंद्र सरकार के बड़े कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने कमेटी को स्पष्ट तौर पर बता दिया था कि उन्हें पुरानी पेंशन के अलावा और कुछ भी मंजूर नहीं है। इस समस्या को हल करने का एकमात्र तरीका यही है कि बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को खत्म किया जाए और परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' को बहाल किया जाए। समिति के अध्यक्ष ने आश्वासन दिया है कि कर्मचारी पक्ष द्वारा अपने ज्ञापन में दिए गए सभी बिंदुओं पर ध्यान दिया जाएगा। शिव गोपाल मिश्रा ने कहा, एनपीएस में कर्मियों जो पेंशन मिल रही है, उतनी तो बुढ़ावा पेंशन ही है। कर्मियों ने कहा है कि देश में सरकारी कर्मियों, पेन्शनरों, उनके परिवारों और रिश्तेदारों को मिलाकर वह संख्या दस करोड़ के पार पहुंच जाती है। अगर ओपीएस लागू नहीं होता है तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को राजनीतिक नुकसान झेलना होगा। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने ओपीएस को अपने चुनावी एजेंडे में शामिल किया है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत के पीछे ओपीएस एक बड़ा कारण रहा है।

पेंशन न तो एक इनाम है और न ही अनुग्रह की बात
एआईडीईएफ के महासचिव सी.श्रीकुमार के मुताबिक, एनपीएस में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है। जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं, उन्हें महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है। एनपीएस में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही। रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मियों को जानबूझकर कष्टों में धकेला जा रहा है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बीडी चंद्रचूड, जस्टिस बीडी तुलजापुरकर, जस्टिस ओ. चिन्नप्पा रेड्डी एवं जस्टिस बहारुल इस्लाम शामिल थे, के द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट पिटीशन संख्या 5939 से 5941, जिसको डीएस नाकरा एवं अन्य बनाम भारत गणराज्य के नाम से जाना जाता है, में दिनांक 17 दिसंबर 1981 को दिए गए प्रसिद्ध निर्णय का उल्लेख करना आवश्यक है। इसके पैरा 31 में कहा गया है, चर्चा से तीन बातें सामने आती हैं। एक, पेंशन न तो एक इनाम है और न ही अनुग्रह की बात है जो कि नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर हो। यह 1972 के नियमों के अधीन, एक निहित अधिकार है जो प्रकृति में वैधानिक है, क्योंकि उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के खंड '50' का प्रयोग करते हुए अधिनियमित किया गया है। पेंशन, अनुग्रह राशि का भुगतान नहीं है, बल्कि यह पूर्व सेवा के लिए भुगतान है। यह उन लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में, नियोक्ता के इस आश्वासन पर लगातार कड़ी मेहनत की है कि उनके बुढ़ापे में उन्हें ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ दिया जाएगा।

Wednesday, August 2, 2023

G-20 SUMMIT: जी-20 की अध्यक्षता भारत के लिए एक जिम्मेदारी- सीएम धामी




रुड़की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रूड़की में थिंक इण्डिया के सहयोग से आयोजित ’’जी-20 इम्पैक्ट समिटः अनशीलिंग द पोटेंशियल’’ कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा कि जी-20 की अध्यक्षता भारत के लिए एक राजनयिक अवसर नहीं, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है, जो विश्व के भारत पर भरोसे का एक पैमाना है। उन्होंने कहा कि जी-20 ऐसे देशों का समूह है, जिनका आर्थिक सामर्थ्य विश्व की 85 प्रतिशत जीडीपी का तथा विश्व के 75 प्रतिशत व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें विश्व की दो-तिहाई जनसंख्या समाहित है, जो आजादी के अमृतकाल में हमारे लिये गर्व की बात है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष के जी-20 की थीम वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर है, जो मूल रूप से भारतीय संस्कृति द्वारा विश्व को दिए गए सिद्धांत वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है, जिसका अर्थ है समस्त विश्व एक परिवार है। जी-20 के लोगो का उल्लेख करते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि जी-20 का यह लोगो केवल एक प्रतीक चिन्ह नहीं बल्कि एक संदेश है, एक भावना है, जो हमारी रगो में है, यह एक संकल्प है, जो हमारी सोच में शामिल है। उन्होंने कहा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मंत्र के जरिए विश्व बंधुत्व की भावना को हम सदियों से जीते आए हैं तथा हमारी प्राचीन संस्कृति का यह विचार इस लोगो और थीम में प्रतिबिंबित होता है। उन्होंने कहा कि इस लोगो में कमल का फूल, भारत की पौराणिक धरोहर, हमारी आस्था, हमारी बौद्धिकता, को चित्रित करता है तथा भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है।

मुख्यमंत्री ने जी-20 के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुये कहा कि इसका उद्देश्य विविधता का सम्मान करते हुए दुनिया को एक मंच पर लाना है। उन्होंने कहा कि आज विश्व के लोगों को भारत को जानने, समझने की उत्कट जिज्ञासा है। वे हमारी सांस्कृतिक धरोहरों का अध्ययन, वर्तमान की सफलताओं का आकलन तथा हमारे भविष्य को लेकर अभूतपूर्व आशाएं प्रकट कर रहे हैं। ऐसे में हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम इन अपेक्षाओं से आगे बढ़कर दुनिया को भारत की क्षमताओं, दर्शन, सामाजिक और बौद्धिक ताकत से परिचित कराएं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जी-20 की तीनों बैठकों में उन्होंने बहुत कुछ सीखा, जहां पहली बैठक में उन्हें विश्व के महान वैज्ञानिकों से मिलने का मौका मिला वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर वर्किंग ग्रुप की बैठक में अन्य विषयों के अलावा उन्होंने जाना कि किस प्रकार जापान ने भूकंपरोधी भवन बनाने की ऐसी तकनीक का विकास किया है, जो आपदा के समय में भी जापान के लोगो व मकानों को सुरक्षित रखती है, यह भारत और विशेष रूप से उत्तराखंड के लिए उपयोगी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के डायनामिक लीडरशिप में आज भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था, नालेज बेस्ड इकोनॉमी, समृद्ध लोकतंत्र, वैश्विक मंच पर शांतिदूत तथा मानवता के प्रयासों में अग्रदूत के रूप में स्थापित हो रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व में भारत आज विश्व की पांचवी आर्थिक शक्ति बन गया है। उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व भारत को समृद्ध, शक्तिशाली तथा आर्थिक रूप से मजबूत नये नजरिये के रूप में देख रहा है। चाहे वह रूस-यक्रेन युद्ध में अप्रवासी भारतीयों को सकुशल वापस लाने की बात हो, कोराना काल में विश्व के अनेक देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने की बात हो, हर क्षेत्र में आज भारत अग्रणी की भूमिका निभा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आज भारत बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुये कहा कि उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य को जी-20 की तीन बैठकों का आयोजन करने का अवसर प्रदान किया तथा इस महत्त्वपूर्ण दायित्व को हमने अच्छी तरह निभाया। उन्होंने कहा कि जी-20 की तीन बैठकों के माध्यम से हमने देवभूमि से ’अतिथि देवों भव’ का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मैं खुद जब जी-20 की बैठकों में विभिन्न देशों के डेलीगेटस से मिला और मैंने जब उनका भारत के प्रति प्रेम देखा तो वे पल मेरे लिए अविस्मरणीय थे।

आई.आई.टी. रूड़की का उल्लेख करते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि यह संस्थान 176 वर्षों से भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में देश को गौरवान्वित करता आ रहा है तथा यहां से अध्ययन करने वाले अनेकों विद्यार्थी आज देश व विदेश के अनेकों महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं देते हुये अपने ज्ञान एवम् कुशलता से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तथा शोध के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।

पुष्कर सिंह धामी ने कार्यक्रम में विद्यार्थियों का आह्वान किया कि उनके सामने अनेकों अवसर व चुनौतियां हैं तथा जो चुनौतियां हैं, उन्हें परिश्रम से, अवसर में, बदलने में उन्हें निश्चित रूप से सफलता मिलेगी।

’’जी-20 इम्पैक्ट समिट अनशीलिंग द पोटेंशियल’’ कार्यक्रम को निदेशक भारतीय प्रौद्यागिकी संस्थान रूड़की प्रो0 के0के0 पन्त, प्रो0 एय0एच0 उपाध्याय, सार्थक पाण्डया ने भी सम्बोधित करते हुये इस पर विस्तृत प्रकाश डाला।

इस अवसर पर विधायक प्रदीप बत्रा, जिला पंचायत अध्यक्ष किरण चौधरी, भाजपा जिला अध्यक्ष रूड़की शोभाराम प्रजापति, जिलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय सिंह सहित सम्बन्धित पदाधिकारी एवं अधिकारीगण उपस्थित थे।

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