केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की जो रूपरेखा (एनसीएफ) लॉन्च की है, उसमें उन सभी तत्वों को शामिल किया गया है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में प्रस्तावित किए गए थे। हर देश की तरह भारत भी यह चाहता है कि उसकी शिक्षा पद्धतियां यहां की संस्कृति और ज्ञान परंपरा से आलोकित हों और शिक्षा व्यवस्था की जड़ें देश की ज्ञानार्जन परंपरा से जुड़ी हों। गौरतलब है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का ब्रिटिशकालीन अनुभव अच्छा नहीं रहा। इसका उद्देश्य एक वर्ग विशेष को फायदा पहुंचाना और अपने लिए लोग तैयार करना था। लेकिन जो नई रूपरेखा पेश की गई है, उसमें भारतीय शिक्षा व्यवस्था के पुराने अनुभवों और कमियों पर बेहतर ढंग से विचार किया गया है।
नई रूपरेखा में बच्चों पर पड़ने वाले तनाव पर खास ध्यान दिया गया है। पिछले काफी समय से स्कूली बच्चों पर पुस्तकों, पाठ्यक्रम और परीक्षा के बढ़ते भय को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं, जिनके समाधान के लिए एनसीएफ में प्रयास किए गए हैं। वर्ष में दो बार बोर्ड की परीक्षा और छात्रों के पास इन बोर्ड परीक्षाओं में से सर्वश्रेष्ठ अंक चुनने का विकल्प जैसे प्रावधान निश्चित ही बच्चों पर से पढ़ाई के बोझ को हल्का करेंगे। हालांकि इसके लिए स्कूलों और बोर्ड को अपना प्लेटफॉर्म तैयार करना होगा। बच्चे जब भी खुद को तैयार पाएंगे, वे अगली परीक्षा में भाग ले सकेंगे।
दरअसल, साल में एक बार होने वाली परीक्षा में बच्चों को अनेक दिक्कतें आती हैं। साल भर जो भी पढ़ा है, उसे कंठस्थ कर परीक्षा देने का तनाव हम सभी समझ सकते हैं। फिर यही तनाव कोचिंग व्यवस्था के पैदा होने की वजह बनता है और कोटा जैसे कोचिंग के गढ़ पैदा होते हैं। पिछले कुछ ही महीनों में कोटा में 20 से अधिक बच्चों के आत्महत्या कर लेने के मामले सामने आए हैं। पूरा देश ऐसी घटनाओं से शर्मसार होता है। बड़ा सवाल यह है कि ‘कोटा’ क्यों पनप रहा है?
स्कूलों को समझना होगा कि इसकी वजह वे खुद हैं। उनकी लचर व्यवस्थाओं के चलते ही बच्चे कोटा जाने की जरूरत महसूस करते हैं। मेरा सुझाव यह है कि इसके लिए गांवों के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाना होगा। प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी होगी। बच्चों को बचपन से ही प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मानसिक तौर पर तैयार करने की शुरुआत वहीं से करनी होगी। अच्छी बात यह है कि सरकार इसके लिए पूरी तरह से गंभीर है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने स्वयं कहा है कि अब विद्यार्थियों को कोचिंग व रटने के जंजालों से मुक्ति मिल सकेगी।
मैं 1962 से पढ़ा रहा हूं और कई स्कूलों को जानता हूं, जहां स्कूली शिक्षा के साथ प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा की सीख बच्चों को दी जा रही है और ऐसे बच्चे प्रतिस्पर्धाओं में सफल होेते हैं। लेकिन इसके लिए शिक्षकों को भी कमर कसनी होगी, ताकि भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बच्चों पर हावी न हो सके। एनसीएफ रूपरेखा में इन सभी बिंदुओं को संज्ञान में लिया गया है। हालांकि फिलहाल यह किस तरह से होगा, इस पर सीबीएसई और एनसीईआरटी से आगे जानकारी आएगी।
मुझे अपना एक अनुभव याद आता है, जब मैं 1982 में तत्कालीन सोवियत संघ गया था। वहां पांचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की अभिरुचि का खास ख्याल रखा जाता था। सरकार ने आवासीय स्कूल बनवाए थे, जिनमें सामान्य पढ़ाई के साथ बच्चों की अभिरुचियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं। अगर यही पैटर्न भारत में अपनाया जाता है, तो इससे सरकारी स्कूल मजबूत बनेंगे। निजी स्कूलों का चलन कम होगा। इससे कोटा जैसे केंद्र हतोत्साहित किए जा सकेंगे और हर बच्चा देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकेगा। हालांकि एनसीएफ में भी इस मामले को पूरी गंभीरता से लिया गया है। इसमें नौवीं व 12वीं कक्षा के पाठ्यक्रम को इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि छात्र स्वयं तय कर सकें कि उन्हें किस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना है।
अगले शैक्षणिक सत्र के लिए एनसीएफ गाइडलाइंस के अनुसार, पुस्तकें तैयार करने की जिम्मेदारी एनसीईआरटी को सौंपी गई है, जो तीसरी से बारहवीं कक्षा के लिए नए पाठ्यक्रम के अनुसार किताबें तैयार कर रही है। जो इस सारे परिवर्तन का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पुनर्विचार करने की जरूरत है। एनसीएफ के दिशा-निर्देश सभी राज्यों की सहभागिता से तैयार हुए हैं। विभिन्न राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों व सांविधानिक पदों पर बैठे विद्वानों की सलाहों को इसमें शामिल किया गया है।
शिक्षा को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। एनसीईआरटी स्थानिकता का महत्व समझती है। इसीलिए, वह पहले भी कहती रही है कि हर राज्य अपनी मातृभाषा में किताबें तैयार करे और उसमें स्थानीय पाठ्यक्रम/पाठ शामिल करे। अब अगर पर्यावरण पर कोई अध्याय है, तो उसकी विषय-वस्तु तिरुअनंतपुरम और त्रिपुरा में एक समान नहीं हो सकती। लेकिन स्तर एक होना चाहिए। देश के सभी शिक्षा बोर्ड एनसीईआरटी से जुड़े हैं। यह बेशक एक सलाहकारी निकाय है। लेकिन इसकी साख पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। एनसीएफ के दिशा-निर्देश देश की शैक्षिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लाए गए हैं। इसलिए, आलोचना करने से पहले हम सभी को गंभीरतापूर्वक इन दिशा-निर्देशों का अध्ययन करना चाहिए।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का अवलोकन करते हुए मुझे रवींद्रनाथ टैगोर का कथन याद आता है। उन्होंने कहा था कि हर बच्चे को बगैर किसी भेद-भाव के दो वरदान मिले होते हैं। पहला, विचारों की शक्ति और दूसरा, कल्पना की शक्ति। मैं इनमें दो तत्व और जोड़ना चाहता हूं, जिज्ञासा और सृजनात्मकता। जब इन चारों की अवहेलना होती है, तब शिक्षा व्यवस्था कुंठित हो जाती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में इन चारों पर ध्यान दिया गया है, ताकि ज्ञान समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘नवाचार’ पूरी हो सके। लेकिन इनकी कामयाबी निर्भर करेगी शिक्षकों पर, जो कि सही मायनों में राष्ट्र-निर्माता हैं।
हमारी शिक्षा व्यवस्था की मूल आवश्यकता अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की है। इसे नैतिकता और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की है। इसे गांधी के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के कल्याण तक ले जाने की है। 'वसुधैव कुटुंबकम' हमारी ज्ञान परंपरा का आधार रहा है और अच्छी बात है कि किताबों में 21वीं सदी की जरूरतों के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को खास तौर पर शामिल किया गया है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, वह इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने की ओर उन्मुख है।
-शिक्षाविद और एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक