Monday, August 5, 2024

Bangladesh: बांग्लादेश में हजारों छात्र क्यों कर रहे प्रदर्शन, क्या हिंसा के पीछे पाकिस्तानी सेना-ISI का हाथ?


बांग्लादेश में आखिर ऐसा क्या हुआ कि शांतिपूर्ण रूप से चल रहे छात्रों के प्रदर्शन ने उग्र रूप धारण कर दिया? यह आंदोलन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ताधारी आवामी लीग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और सेना के हेलीकॉप्टर में सवार होकर देश छोड़ दिया है। उधर, प्रदर्शनकारियों ने सोमवार को राजधानी ढाका में रैली करने की योजना तैयार की है। इससे पहले देश में हिंसा भड़कने से कई लोगों की मौत हो गई। इस बीच बांग्लादेश में सेना ने कर्फ्यू लगाया है और अधिकारियों ने अशांति को नियंत्रित करने के लिए इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी है। 

प्रदर्शनकारियों-पुलिस के बीच झड़प में 300 लोगों की मौत
इससे पहले रविवार को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में करीब 300 लोग मारे गए। आपको बता दें कि बांग्लादेश में हाल ही में पुलिस और छात्र प्रदर्शनकारियों के बीच हिसंक झड़पें हुईं हैं। दरअसल, प्रदर्शनकारी छात्र विवादित आरक्षण प्रणाली को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं। इसके तहत बांग्लादेश के लिए वर्ष 1971 में आजादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता संग्रामियों के परिवारों के लिए 30 प्रतिशत सरकारी नौकरियां आरक्षित की गईं हैं।

ऐसे भड़की दंगों की आग
प्रदर्शनकारी छात्रों का तर्क है कि मौजूदा आरक्षण के नियमों का फायदा शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग से जुड़े लोगों को मिल रहा है। इसे लेकर प्रदर्शनकारियों ने शेख हसीना सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त किया है। सरकार ने बांग्लादेश में स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने का फैसला लिया। इसके बाद भी सरकार देश में फैली अशांति को नियंत्रित करने में विफल साबित हुई। उधर, आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी प्रदर्शनकारी नाखुश नजर आ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि स्वतंत्रता संग्रामियों  परिजनों को सरकारी नौकरियों में दिया जाने वाला आरक्षण पूरी तरह से खत्म होना चाहिए। बांग्लादेश की सेना के पूर्व प्रमुख इकबाल करीम ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उठाए गए कदमों को लेकर सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस बीच मौजूदा सेना प्रमुख ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है और इस वजह से देश में दंगों की आग और भी अधिक भड़क गई।  


क्या हिंसा भड़कने के पीछे पाकिस्तान की आईएसआई का हाथ है?
अब सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश में हिंसा के पीछे पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी, इंटर सर्विस इंटेलीजेंस (आईएसआई) का हाथ है? बताया गया है कि बांग्लादेश में 'बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर' नाम के छात्र संगठन ने हिंसा को भड़काने का काम किया है। यह छात्र संगठन बांग्लादेश में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी की शाखा है। बताया जाता है कि जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान की आईएसआई का समर्थन प्राप्त है। जमात-ए-इस्लामी ने 1971 में बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन का विरोध किया था और पाकिस्तानी सेना के साथ मिल कर आंदोलनकारियों और खासकर हिंदुओं का कत्लेआम कराया था। उधर, बांग्लादेश सरकार इस बात का पता कर रही है कि क्या मौजूदा स्थिति में आईएसआई ने भी हस्तक्षेप किया है। 

बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था क्या है जिस पर बवाल हो रहा है?
विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था है। इस व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण का प्रावधान था। 1972 में शुरू की गई बांग्लादेश की आरक्षण व्यवस्था में तब से कई बदलाव हो चुके हैं। 2018 में जब इसे खत्म किया गया, तो अलग-अलग वर्गों के लिए 56% सरकारी नौकरियों में आरक्षण था। समय-समय पर हुए बदलावों के जरिए महिलाओं और पिछड़े जिलों के लोगों को 10-10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी तरह पांच फीसदी आरक्षण धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए और एक फीसदी दिव्यांग कोटा दिया गया। हालांकि, हिंसक आंदोलन के बीच 21 जुलाई को बांग्लादेश के शीर्ष न्यायालय ने सरकारी नौकरियों में अधिकतर आरक्षण खत्म कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर क्या फैसला सुनाया?
21 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलट दिया, जिसके तहत सभी सिविल सेवा नौकरियों के लिए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय में, यह निर्धारित किया गया कि अब केवल पांच फीसदी नौकरियां स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा दो फीसदी नौकरियां अल्पसंख्यकों या दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी। वहीं बाकी बचे पदों के लिए अदालत ने कहा कि ये योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए खुले होंगे। यानी 93 फीसदी भर्तियां अनारक्षित कोटे से होंगी। 

कोर्ट ने लगभग आरक्षण खत्म कर दिया, फिर क्यों प्रदर्शन हो रहे हैं?
शुरुआत से प्रदर्शनकारी छात्र मुख्य रूप से स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए आरक्षित नौकरियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि इसकी जगह योग्यता आधारित व्यवस्था लागू हो। प्रदर्शनकारी इस व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे थे, उनका कहना है कि यह भेदभावपूर्ण है और प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी के समर्थकों के फायदे के लिए है। बता दें कि प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब उर रहमान की बेटी हैं, जिन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया था। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद माना जा रहा था कि विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आंदोलन और भी उग्र हो गया। छात्र संगठनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब विरोध प्रदर्शनों का अंत नहीं है और इन्होंने प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। 

जहांगीरनगर विश्वविद्यालय के विरोध समन्वयक महफूजुल हसन ने कहा कि उनकी अभी भी कई मांगें हैं जिन्हें सरकार को पूरा करना होगा, तभी वे प्रदर्शन समाप्त करेंगे। उन्होंने कहा, 'अब हम अपने भाइयों की जान के लिए न्याय चाहते हैं। प्रधानमंत्री को माफी मांगनी चाहिए और जो लोग दोषी हैं, उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।' 

हसन ने कहा कि छात्र समूह उन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को हटाने की भी मांग कर रहे हैं, जहां प्रदर्शनकारियों को हिंसा का सामना करना पड़ा और उन राजनेताओं को भी हटाया जाना चाहिए, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों के बारे में भड़काऊ टिप्पणियां फैलाईं।

ढाका विश्वविद्यालय के छात्र और विरोध-प्रदर्शन के समन्वयक हसीब अल-इस्लाम ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सकारात्मक मानते हैं, लेकिन मांग की कि आरक्षण संशोधन विधेयक संसद में पारित किया जाए। इस्लाम ने कहा कि विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार उनकी संशोधन मांगों के अनुसार एक कार्यकारी आदेश जारी नहीं करती। 

पूरे मसले पर सरकार का क्या रुख है?
बांग्लादेश में ताजा हिंसा के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा पैनल की बैठक की। इसके बाद एक बयान में पीएम हसीना ने कहा, 'जो लोग इस समय सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, वे छात्र नहीं बल्कि आतंकवादी हैं जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं।' प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं अपने देशवासियों से इन आतंकवादियों का सख्ती से दमन करने की अपील करती हूं।'

राजधानी ढाका में एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तोड़फोड़ हुई। इस घटना के बाद स्वास्थ्य मंत्री सामंत लाल सेन ने कहा कि अस्पताल पर हमला अस्वीकार्य है। उन्होंने ने कहा कि हर किसी को इससे बचना चाहिए।

विरोध के शुरुआत प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण प्रणाली का बचाव करते हुए कहा था कि युद्ध में अपने योगदान के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उनका राजनीतिक जुड़ाव कुछ भी हो। उनकी सरकार ने मुख्य विपक्षी दलों, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर अराजकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। 

इस बीच, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने पीएम हसीना से सड़कों से सैनिकों को हटाने और संकट को हल करने के लिए 'राजनीतिक पहल' करने का आग्रह किया है। वहीं सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने कहा है कि सेना हमेशा लोगों के हितों और देश की किसी भी जरूरत के लिए मौजूद रहेगी।

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